कहने को अब कुछ बाकी ही ना रहा,
कुछ शब्द भी न रहे,
तकरार भी न रही,
तख़्त भी न रहे,
तलवार भी न रही,
घर का भी क्या सोचता मैं,
दर भी न रही,
दीवार भी न रही,
पर भी न रहे,
परवाज़ भी न रही,
परवरदिगार से कोई उम्मीद भी न रही,
बड़ा बेसब्र कर के रख दिया था तुमने,
अब ख्याल भी न रहा,
तेरी कोई चाह भी न रही,
बची हैं कुछ चीज़ें अब भी लेकिन,
तेरी यादों में लिपटे ख्याल बचे हैं,
तेरे चेहरे में डूबी ये आँखें बची हैं,
तेरा नाम लेने से कांपते से होंठ,
तेरी हांथों से छुई हुई थोड़ी से खाल,
तेरे दरिया में डूबा हुआ छोटा सा दिल,
तेरे बिना खाली पड़ा मेरा शरीर,
तेरे घर जैसा अब भी बचा है,
बचा है अब भी वही सवाल,
कि इतनी ज़रूरी तू क्यों हैं,
समंदर में डूबे हुए कुछ सूखे पन्ने,
स्याही सी बहती हुई नदिया की धारा,
तेरी ना ना मेरा इंतज़ार आज भी बचा है।
Jun 15, 2020 10:44 PM