Saturday, February 14, 2026

चिड़िया

शाम को बैठा था बाग में,

पक्षियों की चहचहाहट में,

एक चिड़िया थी जो बार बार,

आती मेरे पास और उड़ जाती,

वो हंसती थी तो मैं हंसता,

वो गाती तो मैं सुनता था,

उसका हर्ष-नृत्य मुझे जीवंत कर देता,

उसकी आवाज़ उसकी बोली,

मेरे दिल की मीठी गोली थी,

वो बार बार उड़ती, बार बार आती,

कभी दाएं से कभी बाएं से,

आती मेरे पास ही लौटकर,

उसे पता था मेरी नज़र में,

उसका ही दीदार लगा है,

वही है मेरे कण कण में,

झरनों से बहते ख़यालों में,

इन चिड़ियों के झुंड में,

मेरी नब्ज़ उसी से चलती है,

मुझे भी यकीं था,

उसकी उड़ान पर,

उसकी नज़र पर,

उसका चेहरा मेरे

ख्वाबों से मिलता था,

जैसे चांद की डोरियों से

उसको बुना गया था,

रेशा रेशा कतरा कतरा,

वो चमक बिखेरती थी,

उसकी पहली झलक के लिए

मैं हर दिन बेताब रहता था,

उसकी एक मुस्कुराहट

मेरे पूरे दिन का इनाम थी,

उसके होठों के रंग

मेरी सांसें रोक देते थे,

उसके चेहरे की रंगत,

मेरी रातों की ठंडक थी,

उसके पंखों के धागों में,

मेरी ज़िंदगी भर के रंग थे,

उसकी उन गहरी आँखों में,

मेरा ये ख़ाली सा जीवन,

जीने की वजहें ढूंढता था,

जब मैं टूटता तो,

उसकी आँखों की चुप्पी,

धीरे से मेरे दिल पर हाथ रख देती,

मेरे अकेलेपन में,

वो मेरे आसपास,

मेरी परछाई बनकर उभरती,

मैंने देखा था उसकी आँखों में,

अपना बिखरा पड़ा संसार,

जिसे वो समेट सकती थी,

उसकी आँखों की गहराई में,

मेरा पूरा विश्व समाया था,

उसमें वो बात थी,

वो मुझे संभाल सकती थी,

मुझ आवारा को, बंजारा को,

एक ठिकाना दे सकती थी,

लेकिन ऐसा तो हो न सका,

उन बाहों में मैं रो न सका,

हम दोनों में एक दूरी थी,

मेरी भी कुछ मजबूरी थी,

मैंने भी धोखे खाये थे,

अपनों के खंजर पाए थे,

एक दिन उसकी उन आँखों में,

देखा एक आंसू का कतरा,

मुझे लगा ये मेरी वजह से

उसकी आँख में आया है,

मैंने खुद को कोसा बहुत,

सोचा जिसकी मुस्कान से

मेरे सीने में नरमी है,

मैं उसके दुख का कारण बनूँ,

ये पाप नहीं मैं कर सकता,

उसके मन में मेरा भय हो,

ऐसा तो होने नहीं दे सकता,

मैं छोड़ चला वो बाग बगीचा,

उड़ता गया उस आसमान में,

जब ठहरा तो एहसास हुआ,

मैं दिल तो उसके कदमों में

ही बिना बात के भूल आया।


चैन ओ सुकून कहाँ छोड़ आया?

क्यों मन को किसी से

इतनी

बेपरवाही से जोड़ आया?


अब कुछ टूटा हुआ सा है,

ख़ाली ख़ाली सा लगता है,

बहुत देखा पीछे मुड़कर,

कोई गलियारे में था ही नहीं।


बीती यादें बीती बातें,

मैं तो पीछे छोड़ आया था,

फिर क्या है जो टटोलता हूँ?

यादों के किनारों में ढूंढता हूँ?


लगता है बीती बात हुई,

स्वप्नों सी काली रात हुई,

आँखों को बोझिल करती हैं,

यादें अब मुझको डसती हैं।


आज भी उसकी मुस्कुराहट,

मेरे भीतर के शमशान को,

हरियाली से भर देती है।


ऐ काश मुझे वो प्रेम मिले,

जो जीवन भर मैं देता आया,

जितना मैंने दिया है अगर,

उसका एक हिस्सा मिल जाये,

तो शायद मैं भी बोल सकूं,

हाँ मुझको भी कभी प्रेम मिला था।


Feb 14, 2026 10:18 PM

चिड़िया

शाम को बैठा था बाग में, पक्षियों की चहचहाहट में, एक चिड़िया थी जो बार बार, आती मेरे पास और उड़ जाती, वो हंसती थी तो मैं हंसता, वो गाती तो मैं ...