Saturday, August 4, 2012

निर्भय

मैं आगे बढ़ता रहता हूँ,
पीछे मुड़कर नहीं देखता,
यादों और बीती बातों को,
किस्मत से नहीं तौलता।

मंज़िलें तो आती रहती हैं,
मैं रुककर नहीं सोचता,
हर एक मंज़िल के पत्थर पर,
किसी का रास्ता नहीं देखता।

मैं हर पल सोचा करता हूँ,
मैं हर पल बढ़ता रहता हूँ,
मैं हर पल वादा करता हूँ,
खुद को मैं कभी नहीं रोकता।

यूँ खुद का ही मैं साथी हूँ,
यूँ खुद ही राहें पाता हूँ,
हर रात यही सब सोचकर,
मैं खुद को नहीं मारता।

मैं बात पते की करता हूँ,
मैं काम समझ कर करता हूँ,
ये वक़्त मुझे सिखलाता है,
मैं रुकना ही नहीं चाहता।

मेरे आगे कितने पत्थर हैं,
ये राह मुझे बतलाती है,
ठोकर तो लगती रहती है,
ठोकरों से अब नहीं रुकता।

ये सफर मुझे सिखलाते हैं,
ज़िन्दगी बिना आराम की है,
हर वक़्त यहाँ बस चलना है,
अब चलने से नहीं थकता।

आँखों में ऐसे सपने हैं,
सच जब होंगे तब अपने हैं,
सपनों की दुनिया में बहकर,
उनकी धारा मैं नहीं रोकता।

ज़िन्दगी मेरा नाम लेती है,
साँसें भी एक मुकाम देती हैं,
कहती है मेरी धड़कन भी,
तू अब किसी से नहीं डरता।

Written During A Journey On Train....

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