Sunday, May 2, 2021

अंतर्द्वंद

एक सवाल उठा है मन में

याद रखूं या भूल जाऊं तुम्हें

कैसे भूलूँ सुबह की किरणें

कैसे भूलूँ तन्हाई

सभी जगह बस तुम ही तुम हो

तुम ही मेरी परछाईं

रात के कोहरे में भी तुम हो

तुम ही धूप सबल छायी

फूलों में देखा है तुमको

तुम्हीं महक बनके आईं

किसी तेज़ चंचल हवा में

किसी पेड़ की कनकलता में

नदी बनी चलती जाती हो

पल पल लेती अंगड़ाई

एक नदी तो तुम भी हो

सभी घाट तुममें मिलते

कोई किनारा टूट न जाये

बड़ा संभल कर चलती हो

खड़ा हूँ मैं भी बीच धार में

कुछ तो ध्यान करो मेरा

इस पार रहूँ उस पार रहूँ

या मुझे डूबा दो बीच घनेरा

मुझे खींच ले जाओ धार में

मुझे मिला लो अपने रंग में

मुझे रात की नींद भी दे दो

कभी तो देखूं एक सवेरा

आज फंसा हूँ अंतर्द्वंद में

तुम ही दिखती हो कण कण में

कैसे तुमसे नज़रें फेरूं

कैसे देखूं कोई नज़ारा

नज़र भी तुम हो

दरस भी तुम हो

और चमकता उजियारा


May 2, 2021          11:25 PM

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