Saturday, April 14, 2012

धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे

बचपन की यादों में से चुराई हुई एक कविता


हँसते हँसते तुम मेरी यादों को दिल से मिटाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे,

भूल जाओगे कि हमने भी बाँटी थी रोटी,
खाए भी ऐसी थाली में जो थी थोड़ी छोटी,
मगर उस थाली से बड़े हमारे दिल थे,
बड़े प्यार से हम एक दूसरे का मुँह भरते थे,
उन टुकड़ों की मिठास को अपने दिल से मिटाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे,

भूल जाओगे कि हमने भी खिलौने थे तोड़े,
शामभर खेलकर भी ना थकते थे थोड़े,
उन टूटे खिलौनों में हम मुस्कुराते थे,
उन खिलौनों से थोड़े से सपने चुराते थे,
उन गुड़ियों के खेलों को अपने दिल से मिटाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे,

भूल जाओगे हमने था बारिश में नहाया,
उन ताज़ी सी बूँदों को माथे पे सजाया,
वो बारिश भी धुलकर खुश सी हो जाती थी,
खुशियों से हमारी मुलाक़ात सी हो जाती थी,
उस सावन की बारिश को अपने दिल से मिटाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे,

भूल जाओगे हम दोनों मिलकर के रोते थे,
हम सब के माँ बाप जब ग़ुस्सा होते थे,
घरों में जब हमने उधम थी मचाई,
सब मिलकर हँसते जब शैतानी थी रंग लाई,
उन शैतानियों को अपने दिल से मिटाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे,

भूल जाओगे जब हमने शीशा था तोड़ा,
सुनकर मेरी बात माँ का गरमाना थोड़ा,
छुट्टी होते ही खेतों से गन्ने चुराना,
मीठे रस के टुकड़ों से यूँ ही मुस्कुराना,
उन हँसते लम्हों को अपने दिल से मिटाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे,

भूल जाओगे तुम मेरे गीतों के बोल,
वो सारी बातें जब खुल गई थी पोल,
मेरी इस हस्ती को इस क़दर भुलाओगे,
चाहोगे तो भी ना मुझे याद कर पाओगे,
हर बात हर हँसी इस तरह दफ़नाओगे,
ढूँढोगे उनकी क़ब्र तो भी ना ढूँढ पाओगे,
हर कड़ी तोड़कर जब तुम दूर जाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे,
धीरे धीरे तुम मुझको भूल जाओगे……


WRITTEN IN JULY 2011

कुछ सवाल तुम्हारे लिए

ये चाल है या कोई साज़िश हो रही है,
क्यों इन लम्हों के दरमियाँ हम दूर हो रहे हैं?
क्या तुम्हें नहीं लगता साथ बीते हुए पल हमें फिर से बुला रहे हैं?
ये क्यों हो जाता है, ये कैसे हो रहा है?
क्यों जो बातें हमें पास लाती थीं, दूर ले जा रही हैं?
क्या हमारा अभिमान हमारे रिश्ते को निगल रहा है?
क्या सवेरा शाम सा ही ढल रहा है?
क्या तुम्हारी ही ख़ुशी मेरी ख़ुशी नहीं थी?
क्या तुम्हारी ही हँसी मेरी हँसी नहीं थी?
हमारे रिश्ते में दूरियाँ कहाँ से आ रही हैं?
इन्हीं दूरियों में ग़लतफ़हमियाँ समा रही हैं....
क्या तुम्हें नहीं लगता हम अपने रास्ते बदल रहे हैं?
या कि लगता है नींद में करवट बदल रहे हैं?
सफ़र कैसा भी था हम बस आपके सहारे पर जी रहे हैं.....
क्यों तुम्हारी उम्मीद हमेशा मुझको रहती है?
तुम्हारा हाल जानकर ही साँसों में साँस बहती है....
तड़प दिल की निगाहों से बयान हम क्यों नहीं कर रहे हैं?
तुम्हारे लिए ही तो चेहरे पर इक हँसी सजा रखी है....
मुझे समझना ही मुश्किल है, समझ पाओगी तुम कैसे?
मेरा दिल भी न धड़का जब से तुम्हें देखा नहीं हँसते.....
जिस दिन मेरे इन सवालों का जवाब तुम दोगी,
उस दिन समझ लेना हम तुमसे दूर हो गए हैं....
लेकिन तुम्हारे साथ की आशा में हम क़यामत से जी रहे हैं....


WRITTEN ABOUT BROKEN RELATIONSHIP'S ...!!!

ऐसी दोस्ती

साथ ही चले थे हमारे रास्ते जब से हमने थामे थे हाथ,
लेकिन वक़्त की अंगड़ाइयों के साथ मुझे पीछे छोड़ गए आप,
कहा था हर आँसू हर मुस्कान में देंगे तुम्हारा साथ,
फिर जाने क्यों मुँह मोड़ लिया, जाने क्या थी बात?
दोस्ती निभाई ऐसी कि दिल में भी हज़ारों सुराख़ कर दिए,
उनके ना निकले एक भी आँसू जो हमारे दामन में अंगारे रख कर चल दिए,
कितने ही दिन बीत गए हम उनकी एक हसीं मुस्कान के साथ जीते रहे,
वो हमारे दिल का दर्द बढ़ाकर हमारे आँसुओं से पौधे सींचते रहे.....


WRITTEN IN SEPTEMBER 2011

This Is What It Takes

When I miss you, My eyes scream & drains, My heart cries & breaks, If this is what it takes, If this is what it takes, When I miss y...