Monday, April 11, 2011

आशिक़ी की कसक

दिल की गहराइयों ने मेरी कुछ उनसे कहा ऐसा जिसे वो सुन न सके,
एक झलक भी न नज़र उठा कर देखा मुझे,
बस कह दिया जाओ मोहब्बत नहीं है तुमसे,
इसी बात ने वार ऐसा किया जो हम सह न सके।

उनकी दीवानगी में खोए रहे उम्र भर,
उनके चेहरे को चाँदनी सा कहते रहे,
हमेशा उन्हीं की खुशी की आस की,
भले ही कितने आँसुओं में बहते रहे।

उन्हें दूर से यूँ ही तकते रहे,
कहीं देख न ले यूँ ही डरते रहे,
मगर न पता था कि वो प्यार क्या था,
चिरागों से जब उसको रोशन किया था।

उन्हीं चिरागों ने जीवन है फूँका ये मेरा,
जैसा रातों में जलता सुलगता सवेरा,
जले दिल से ज़्यादा हम जलते रहे,
अंधेरों में छिपकर सिसकते रहे।

मेरा दिल भी मुझसे ये पूछे हमेशा,
क्यों बंजर में खेती हम करते रहे?
कसकती रहेंगी ये साँसे हमेशा,
लबों पे जब भी उनका नाम होगा।

कह ये देना उन्हें के रख ले इज़्ज़त किसी के प्यार की,
वरना आशिक कोई फिर न बदनाम होगा.....



PENNED AT 9:30PM, MAY6,2010

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