Monday, April 11, 2011

छोटा सा सफ़र

ज़िन्दगी की सोच ले आई कहाँ पे,
है वादों की तस्वीर झूठी जहाँ पे,
कोई तपके सोना हुआ है यहाँ पे,
कोई अपनी पहचान खोता यहाँ पे।



ये जलते क़दम, ये झुकती कमर,
यही मेहनतकशों की तस्वीर है,
चुभन काँटे की या शिकन माथे की,
ये सब अपनी-अपनी ही तक़दीर है।



अगन का अगन से भी मिलना कहाँ पे,
है पानी का सैलाब बहता जहाँ पे,
कोई खुश है इतना कि सारे जहान से,
कोई है जो रो भी न सकता यहाँ पे।



ये अंधी नज़र, उम्र का असर,
बस कुछ दिनों का ही खेल है,
कहाँ से कहाँ तक है चलना सफ़र,
दिलों से दिलों का यहीं मेल है....



PENNED AT 2:30 AM, MAY,5,2010

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